संत तिरुवल्लुवर की कहानी – Sant Tiruvalluvar Story in Hindi

दोस्तों क्या आप भी संत तिरुवल्लुवर की कहानियों (Sant Tiruvallur Ki Kahani in Hindi) के बारे में पढ़ना चाहते हैं| तो आज हम अपने इस पोस्ट में हम आपको तिरुवल्लुवर की अच्छी अच्छी कहानियों के बारे में बताने जा रहे हैं| परंतु उससे पहले हम आपको संत तिरुवल्लुवर के बारे में बताएंगे कि वह कौन थे तो चलिए दोस्तों अब शुरू करते हैं।

संत तिरुवल्लुवर कौन थे?

संत तिरुवल्लुवर भारत के महान संत थे| उन्हें दक्षिण भारत का कबीर भी कहा जाता था| तमिल भाषा के वेद वेद की भाँती सम्मानित ग्रन्थ ‘तिरुक्कुरल’ के रचियता का समय आज से लगभग ढाई हजार साल पहले का माना जाता है| जनमानस में पीढ़ी दर पीढ़ी अंकित उनकी छवि के अतिरिक्त उनके जीवन के संबंध में और कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है| संत तिरुवल्लुवर अपनी पत्नी के साथ रहते थे| उनकी पत्नी सूत काटती थी और संत जी उसका कपड़ा बना कर बेचते थे| संत तिरुवल्लुवर के शांत स्वाभाव और सहनशीलता की सर्वत्र सहाना होती थी।

1. संत तिरुवल्लुवर कहानी – संस्कार बड़ा या संपत्ति

दक्षिण भारत के एक महान कवि तिरुवल्लुवर समाज कल्याण के काम में बड़े प्रयत्नशील थे| वह अपने वचनों से समाज कल्याण के काम में व्यस्त रहते थे और लोगों की समस्याओं को दूर करती थे| एक बार की बात है कि एक बार कवि तिरुवल्लुवर एक सभा करके उठे थे| जैसे ही वह उठने लगे उन्होंने देखा कि उनके सामने एक सेठ हाथ जोड़ कर बैठा है| उन्होंने सेठ से पूछा कि आपको क्या परेशानी है? आप ऐसे अवस्था में क्यों बैठे हैं?

सेठ ने बताया कि मेरा एक पुत्र है और वह गलत संगत में फस गया है| मैं अपने पुत्र से बहुत परेशान हूं वह गलत संगति में पड़ने की वजह से मेरे पैसों को लुटा रहा है| उनकी बर्बादी कर रहा है| तोकवि तिरुवल्लुवर ने सेठ से पूछा तुम्हारे पिताजी तुम्हारे लिए कितनी संपत्ति छोड़ कर गए थे| तो सेठ ने कहा कि वह बहुत गरीब आदमी थे| वह मेरे लिए कुछ भी छोड़कर नहीं गए थे| उन्होंने मुझे सिर्फ संस्कार दिए हैं| ये सारा पैसा मेने खुद म्हणत करके कमाया है| 

तब कवि तिरुवल्लुवर ने कहा कि तुम्हारे पास बहुत ज्यादा पैसा है| तुमने अपने बेटे को बहुत सारा धन दिया है| जिसे वह आंख बंद करके इस्तेमाल कर रहा है| तुमने उसे संस्कार नहीं दिए हैं| यह बात सुनकर सेठ की आंखें खुल गई और उसे समझ आ गया कि उसे अपने बेटे को धन की जगह संस्कार देने चाहिए थे| तब उस सेठ ने कवि तिरुवल्लुवर के सामने प्रण लिया कि वह अब अपने बेटे को धन नहीं देगा बल्कि उसे संस्कार देकर उचित मार्ग दिखाएगा

Moral

  • किसी भी व्यक्ति को जिंदगी में संस्कार अवश्य देना चाहिए। 
  • संस्कार ही व्यक्ति को उचित मार्ग दिखाता है।
  • संस्कार के बिना किसी भी प्रकार का धन व्यर्थ है।

2. संत तिरूवल्लुवर की इस सीख ने अभिमानी युवक के मन को किया निर्मल

शमा और प्रेम मनुष्य में 2 ऐसे गुण है जो बड़े से बड़े अहंकारी मनुष्य के मन को जीत लेते हैं| यह कहानी दक्षिण भारत के ऐसे संत तिरुवल्लुवर की है जो बहुत ही शांत और क्षमाशील स्वभाव के थे| वह जात से जुलाहे थे। एक दिन वह अपने हाथ से बनी हुई साड़ियां बेचने के लिए बाजार चले जाते हैं| वहां पर एक जगह देखकर वह बैठ जाते हैं और अपनी साड़ियां बेचना शुरू करते हैं| सुबह से दोपहर हो जाती है परंतु कोई भी व्यक्ति हैं उनके पास साड़ी खरीदने नहीं आता| परंतु तिरुवल्लुवर परेशान नहीं होते वे धैर्य रखकर वहां बैठे रहते हैं| 

तभी एक युवक उनके पास साड़ी खरीदने के लिए आता है जोकि देखने में बड़े घराने का लगता है| वह तिरुवल्लुवर के पास आता है और उनसे कहता है कि मुझे साड़ियां दिखाइए तो संत जी उन्हें साड़ियां दिखाना शुरू कर देते हैं| फिर वह युवक एक अच्छी सी साड़ी को उठाता है और पूछता है कि इसका क्या मूल्य है| तो तिरुवल्लुवर बोलते हैं कि यह 10 रुपए की है| युवक साड़ी के दो टुकड़े कर देता है फिर से पूछता है कि इसका मूल्य कितना है तो तिरुवल्लुवर बोलते हैं कि इन दोनों का मूल्य 5 रुपए है| 

फिर वह युवक साडी के और टुकड़े कर देता है और संत जी से साडी का मूल्य पूछता है| तो संत जी बड़ी विनम्रता के साथ बोलते हैं कि इसका मूल्य ढाई ढाई रुपए है| वह युवक साड़ी का उठाता है उसके और भी टुकड़े कर देता है पूछता है कि इसका मूल्य क्या है कितना है तो संत जी बोलते हैं कि इसका मूल्य स्वा स्वा रुपये है| यह देखकर युवक हैरान हो जाता है कि संत जी अभी भी धैर्य के साथ बैठे हैं| उनको बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आ रहा है, बिल्कुल भी परेशान नहीं हो रहे हैं| तब वह आखिर में युवक बोलता है कि अब इस साड़ी में तो सिर्फ टुकड़े ही रह गए हैं अब इसमें खरीदने लायक कुछ बचा ही नहीं है| 

तो फिर वह युवक अपने जेब से 10 रुपये निकालता है और संत जी को लेने के लिए कहता है| संत जी उसे पैसे नहीं लेते हैं और उसे कहते हैं कि जब तुमने साड़ी ही नहीं खरीदी तो मैं तुमसे 10 रुपये कैसे ले सकता हूं। संत जी के मुख से विनम्रता पूर्वक ऐसे शब्द सुन के वह युवक संत जी से माफी मांगने लगता है और उन्हें बोलता है कि मुझसे अपराध हुआ है आप मुझे माफ कर दीजिए तो संतु से बोलते हैं कि तुम्हारे 10 रुपये देने से साड़ी का मूल्य नहीं भर पाएगा| 

जरा सोचो कपास पैदा करने में किसान को कितनी ज्यादा मेहनत लगती है और फिर कपास को ढूंढने और सूत काटने में कितना समय और श्रम लगता है और साड़ी को बुनने में सोचो मेरे परिवार को कितना ज्यादा समय लगा होगा|  युवक रोते हुए संत जी के चरणों पर गिर गया और पूछने लगा कि जब मैं साड़ी फाड़ रहा था तो तब आप ने मुझे क्यों नहीं रोका| तो संत जी ने बोला कर मैं तुम्हें उस समय रोक देता जो शिक्षा तुम्हें अब मिली है वह तुम्हें तब नहीं मिलनी थी| यह सुनने के बाद उस अभिमानी व्यक्ति के मन में संत जी के प्रति इज्जत और श्रद्धा भावना पैदा हो गई और संत जी की इस सीख से उसका अहंकार समाप्त हो गया और उसका मन निर्मल हो गया।

Leave a Comment

Your email address will not be published.