राजा भोज की कहानी | Raja Bhoj Ki Kahani in Hindi

दोस्तों क्या आप भी राजा भोज की कहानियां पढ़ना चाहते हैं (Raja Bhoj Ki Kahani in Hindi)? आज के इस पोस्ट में हम आपको राजा भोज कौन थे? और राजा भोज से संबंधित रोचक कहानियां आपके साथ शेयर करने जा रहे हैं| अगर आप भी राजा भोज की कहानियां को पढ़ना चाहते हैं तो हमारे इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें।

राजा भोज कौन थे?

राजा भोज का जन्म 980 में बसंत पंचमी के दिन हुआ था| उनका जनम महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैन में हुआ था| उनके पिता का नाम सिद्धूराजा था| जिस समय राजा भोज का जन्म हुआ था उस समय उज्जैन पर उनके पिता जी राजा सिद्धूराजा का शासन चलता था| राजा भोज को राजा विक्रमादित्य का वंशज भी माना जाता था क्योंकि राजा भोज उज्जैन में पैदा हुए थे| राजा भोज को मात्र 15 साल की उम्र से ही राज्य की बड़ी जिम्मेदारियां सौंप दी गई थी| राजा भोज ने 1000 ईस्वी से 1055 जाए तक शासन किया था।

1. राजा भोज और सत्य

1 दिन राजा भोज गहरी नींद में सो रहे थे| तब उन्हें सपने में एक तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए तो राजा ने उस वृद्ध पुरुष से पूछा कि महात्मा आप कौन है? वृद्ध ने कहा राजा मैं सत्य हूं मैं तुझे तेरे कार्यों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूं| तुम मेरे पीछे पीछे चलते रहो| कार्यों की वास्तविकता को देखने के लिए राजा भोज वृद्ध के पीछे पीछे चल दिए| राजा भोज दान, पुण्य, तीर्थ कीर्तन करते थे| 

उन्होंने बहुत सारे मंदिर, तालाब, बगीचे भी बनाए थे और इन कार्यों की वजह से राजा भोज के मन में अभिमान आ गया था| वृद्ध के रूप में सत्य राजा भोज को अपने साथ उनकी कृतियों के पास ले गए| वहां जैसे ही सत्य ने पेड़ों को छुआ तो सारे पेड़ सूख, बगीचे बंजर हो गए, भूमि बंजर हो गई| जैसे ही वह मंदिर की ओर गए और मंदिर को छुआ तो मंदिर खंडहर बन गए| वृद्ध ने राजा के यज्ञ, तीर्थ, पूजन के लिए बनाए गए स्थानों, व्यक्तियों और चीजों को जैसे ही छुआ वह भसम हो गई| यह सब देख कर राजा बहुत ही ज्यादा हैरान हो गए| 

तब उस वृद्ध इंसान यानी कि सत्य ने कहा राजा यश की इच्छा में किए गए कार्य केवल हुंकार की पुष्टि करते हैं, धर्म का निर्माण नहीं| सच्ची सद्भावना से निस्वार्थ होकर किए गए कामों से ही उन्हें फल पुण्य के रूप में मिलता है और यह पुण्य फल का रहस्य है| इतनी बात बोल कर सत्या वहां से चले गए और इतने में ही राजा भोज की नींद खुल गई| वह उठे और उन्होंने अपने स्वपन पर गहरा विचार किया | तब से उन्होंने सच्ची भावना से कर्म करना शुरू कर दिया। जिसके बल पर उन्हें न सिर्फ यश कीर्ति की प्राप्ति हुई बल्कि उन्होंने बहुत पुण्य भी कमाया।

2. कर्म की गठरी ( राजा भोज की कहानी )

राजा भोज उज्जैन के प्रसिद्ध राज्यों में से एक थे| उनके राज दरबार में धनलक्ष्मी का साक्षात वास था| उनके दरबार में बहुत से मंत्री थे जिनमें से कुछ मंत्री स्वामी भगत और कुछ मंत्री लापरवाह थे। जो मंत्री लापरवाह और गैर जिम्मेदार थे वे लोगों को बहुत परेशान किया करते थे| जिसकी वजह से राजा के पास उनकी अक्सर ही शिकायतें आती रहती थी| एक दिन क्या हुआ कि राजा ने एक स्वामी भगत मंत्री और एक कामचोर और लापरवाह मंत्री को अपने पास बुलाया और दोनों को एक एक थैला दे दिया और उन्हें जाकर शाहीबाग से फल लाने के लिए कहा| 

वे दोनों अपना अपना थैला लेकर दरबार से बाहर चले गए| जैसे ही वह बगीचे में पहुंचे दोनों ने फल तोड़ने शुरू कर दिए| जो स्वामी भगत मंत्री था उसने अच्छे-अच्छे फूलों को तोड़ा और अपने थैले में डालना शुरू कर दिया और दूसरा मंत्री जो लापरवाह और कामचोर था उसने जो सामने फल दिखा उसे थोड़ा और अपने थैले में डाल दिया| उसने यह भी नहीं देखा कि कौन सा फल पक्का है और कौन सा कच्चा है| वह सोच रहा था कि राजा ने कौन सा उनके थैले को देखना है| इसलिए वह सभी फलों को अपने थैले में डालता गया| 

थैले भरने के बाद दोनों मंत्री दरबार में वापस लौटे| दरबार में पहुंचे तो राजा ने एक और मंत्री को आदेश दिया कि इन दोनों को अपने अपनों थैले के साथ कोटडी में कैद कर दिया जाए| उन्होंने भोजन भी नहीं दिया गया| उन दोनों को भूख लगती थी वह दोनों अपने अपने थैले से फल निकाल कर खा लेते और अपनी भूख को शांत कर लेते थे| 

जिस मंत्री के पास अच्छे फल थे उसके फल ज्यादा दिनों तक चले और जिस मंत्री के पास खराब और गले सड़े फल थे| उसके फल एक-दो दिन में ही खराब हो गए जिसकी वजह से वह अपने पेट को भी नहीं भर पा रहा था| जिसकी वजह से वह मंत्री बेहोश हो गया और उसे इलाज के लिए लेकर जाना पड़ा| इलाज होने के बाद जब उस मंत्री को दरबार में उपस्थित किया गया तो राजा भोग ने उसे समझाया कि हमारा जीवन भी एक सुंदर बगीचे की तरह है| यहां सुंदर और स्वादिष्ट फल के अनुरूप अपने जीवन को चुनना चाहिए| अपने छोटे से जीवन रूपी थैले को उत्तम व्यवहार के साथ भरते रहना चाहिए| बुरे कर्म बुरे समय में काम नहीं आते, अच्छे कर्म ही बुरे समय में काम आते हैं इसलिए हमें अच्छे कर्म ही करने चाहिए।

मोरल

  • जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है उसके साथ हमेशा अच्छा ही होता है। 
  • अच्छे कर्म करने वाला व्यक्ति कभी भी भयभीत नहीं होता और उसका समय किए हुए अच्छाइयों के साथ बीत जाता है।

3. राजा भोज और लकड़हारा

एक बार राजा भोज नदी के किनारे टहल रहे थे उन्हें एक वृद्ध आदमी अपने सर पर लकड़ियों का बंडल ले जाता हुआ दिखाई दिया| वह पसीने से तर था लेकिन उसके चेहरे पर बहुत खुशी थी| तब राजा ने उससे पूछा कि तुम कौन हो उसने बोला कि मैं राजा भोज हूं| राजा ने फिर से पूछा कि तुम कौन हो उसने बोला कि मैं राजा भोज हूं| तब राजा जिज्ञासा से भर गए और बोले तुम राजा भोज हो तो अपनी आए बताओ| लकड़हारे ने जवाब दिया मैं प्रतिदिन छह पैसे कमाता हूं| 

राजा ने उस व्यक्ति से पूछा तो तुम्हारा खर्चा कितना है, तुम्हारा राज्य कैसे चलता है| उस लकड़हारे ने जवाब दिया कि मैं एक पैसा अपनी पूंजी के मालिक को देता हूं, एक पैसा ऋणी को देता हूं, एक पैसा मंत्री को दे देता हूं, एक पैसा बचत के रूप में जमा करता हूं, एक पैसा अतिथियों के लिए रखता हूं और बचा हुआ एक पैसा मैं अपने खुद के खर्च के लिए रखता हूं| 

उसके बाद राजा ने पूछा कृपया मुझे विस्तार में बताएं| उस लकड़हारे ने कहा मेरे माता-पिता मेरी पूंजी के मालिक है, इसलिए एक पैसा मैं उन्हें दे देता हूं|  उन्होंने मेरा लालन-पालन में निवेश किया है| मेरे बच्चे मेरे बड़े हो जाएंगे तो वह भी पितृऋण चुकाएंगे| मेरी पत्नी मेरी मंत्री है तो मैं उसे एक पैसा दे देता हूं| जिससे वह घर चलाती है और वही मेरी सबसे अच्छी मित्र और सलाहकार भी है| 

राजा ने पूछा क्या तुम बचत भी करते हो तब उस बुड्ढे लकड़हारे ने कहा कि जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है| अगर कोई व्यक्ति बचत नहीं करता है तो उस से मुर्ख कोई भी नहीं हो सकता है| मैं प्रतिदिन एक पैसा जमा करता हूं| राजा ने बोलै कि तुम बताना जारी रखो तो लकड़हारे ने कहा कि पांचवा पैसा अपने अतिथियों के लिए रखता हूं| एक गृहस्थ होने के नाते मेरा कर्तव्य बनता है और छठवां पैसा मैं अपने खर्चे के लिए रखता हूं| जिससे मैं अपना रोजमर्रा करता हूं| राजा भोज उस लकड़हारे से बहुत ज्यादा खुश हुआ| 

4. चंद्रभान ने की राजा भोज की सार्वजनिक बेज्जती

चंद्रभान एक गडरिया था| जो सुबह शाम अपने जानवरों को चारा खिलाने के लिए मैदान ले जाया करता था| वह अक्सर ही चारे की तलाश में दूर निकल जाता था| जब उसके जानवर चारा खाने लग जाते थे वह अपने जानवरों को छोड़कर टिल्ले पर बैठ जाता था और उज्जैन के राजा, राजा भोज को अनाप-शनाप बोलता रहता, गालियां देता और सार्वजनिक बेइज्जती करता था| जब वह ऐसा करता था तो लोग उसे रोकते थे| परंतु वह क्रोधित हो जाता था और किसी की नहीं सुनता था और वह फिर से बेजती करना शुरू कर देता था| 

1 दिन किसी मंत्री ने चंद्रभान को गाली देते हुए सुना| उसने चंद्रभान को पकड़ कर टिल्ले से नीचे उतार लिया| जब सिपाही ने उसे उतरा तो डर गया और  कांपने लग गया| फिर वह सिपाही से अपने किए हुए दुर्वयवहार के लिए क्षमा मांगने लगा| उस समय सिपाही ने उसे धमकी देकर छोड़ दिया गया। परन्तु चंद परंतु चंद्रभान का यह रोज का काम था| अगले दिन फिर टिल्ले पर चढ़ता है तो राजा भोज को फिर से गालियां देना शुरू कर देता है| फिर वहां पर सिपाही मंत्री को लेकर आता है और उसे पूरा वाक्य दिखाता है| मंत्री चंद्रभान को पकड़ कर टिल्ले से गसीट कर नीचे उतरता है।

टिल्ले से नीचे उतरकर चंद्रभान रोने लग जाता है, वह डर जाता है| परंतु सिपाही उसे पकड़कर दरबार में ले जाते हैं और उसे राजा के सामने पेश किया जाता है| दरबार में पहुंचकर चंद्रभान डरा हुआ और सर झुका कर खड़ा रहता है और उसका शरीर कांप रहा होता है| उसके पूरे शरीर पर पसीना आने लग जाता है|  जब राजा उससे पूछता है तो उसे कुछ भी याद नहीं होता है यह देखकर राजा हैरान हो जाता है| फिर वह अपने सिपाहियों को बोलता है कि वह टिल्ले पर जाकर देखे वहां पर जरूर कुछ ना कुछ है| जिसकी वजह से यह अनपढ़ भी शिक्षित व्यक्ति जैसी बातें करने लग जाता है और नीतिशास्त्र धर्म राजनीति की बातें करता है और राजा भोज को गालियां देता है| 

वह टिल्ले पर चले जाते हैं और वहां जाकर टीले की खुदाई शुरू करते हैं| जैसे ही वह खुदाई शुरू करते हैं उन्हें नीचे से एक चमचमाता हुआ राज सिंहासन प्राप्त होता है| जिसमें बत्तीस पुतलीया विराजमान थी| वह राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था| राजा भोज ने सिंहासन को देखा और उस पर बैठने की इच्छा व्यक्त की तो फिर शुभ मुहूर्त के साथ स्वास्तिक मंगलाचार्य किया गया, पूजा, पाठ विधि विधान से किया गया और फिर वहां पर राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए उपस्थित हो गए| 

जैसे ही राजा भोज आसन पर बैठने लगे उन 32 पुतलियों में से एक पुतली निकलती है और राजा भोज को बैठने से रोक देती है| राजा भोज से वह पुतली प्रश्न करती है कि क्या राजा भोज आसन पर बैठने के लायक है| स्वयं विचार करें ऐसा कहते हुए राज्य मंत्री नाम की पुतली कहानी कहना आरंभ करती है।

5. राजा का अहंकार भी जिसे जलाना पाया

राजा भोज बहुत ही बुद्धिमान और मैं प्रिय राजा थे| उनको लोग दूर-दूर तक जानते थे| वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे और अपनी प्रजा को अपने पुत्र के समान समझते थे| उनके दरबार में बड़े ही विद्वान आचार्य, मंत्री खुद उपस्थित रहते थे| 

एक बार की बात है एक धनपाल जैन नाम का एक धर्माचार्य था जो कि बहुत ही बड़ा विद्वान था| उसने बाणभट्ट की कादंबरी को प्राकृत भाषा में अनुवाद किया था| उसने अनुवाद को करने में कई वर्ष लगा दिए थे क्योंकि इस अनुवाद को करना कोई आसान कार्य नहीं था| जब उसकी कादंबरी तैयार हो गई थी तो उसने उस कादंबरी को राजा भोज के दरबार में उपस्थित करने की कोशिश की| वह अपनी पांडुलिपि लेकर राजा भोज के दरबार में पहुंच गया है| उनकी पांडुलिपियों को देखकर राजा भोज बहुत ज्यादा खुश हुए| उन्होंने धनपाल जैन की बहुत तारीफ की| 

परंतु राजा भोज के मन में एक लालच आ गया था| उन्होंने धनपाल को बोला कि वह पांडुलिपियों के साथ उनका नाम जोड़ दें| परंतु धनपाल बड़े ही प्रभावीमानी और उच्च आदर्श के व्यक्ति थे उन्होंने राजा की बात सुनकर उनका विरोध किया और उनका नाम जोड़ने से भी मना कर दिया| राजा भोज को निराशा मिलेगी उन्होंने यह उम्मीद नहीं की थी| तब राजा भोज ने पांडुलिपियों को जब्त करा लिया और उन्हें जलाकर राख कर दिया| फिर धनपाल वहां से निराश होकर अपने घर की ओर चला गया और उसने घरआवास धारण कर लिया| अब उन्होंने खाना पीना भी छोड़ दिया था और उन्हें दुनिया में कोई भी काम अब अच्छा नहीं लगता था| 

उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम तिलकमंजरी था वह बहुत ही कुशाग्र बुद्धि की थी| फिर उसने अपने पिता से इस हालत के बारे में पूछा तो उसके पिता ने उसको सारी बात बताई| अपने पिता की बात सुनकर तिलकमंजरी ने अपने पिता को आश्वासन दिया और उसने अपने पिता को बताया कि जब वह कादंबरी का पाठ किया करते थे और लिखा करते थे तो वह भी साथ में याद कर लेती थी| अपनी पुत्री की यह बात सुनकर धनपाल हैरान हो गया|  

फिर तिलकमंजरी ने अपने पिता को दोबारा से पांडुलिपियों बनाने को कहा और इस तरह दोनों ने मिलकर दोबारा से मेहनत करके पांडुलिपिया को तैयार कर लिया| इस बार पिता ने इस पुस्तक का नाम कादंबरी से बदलकर तिलकमंजरी रखा क्योंकि इसमें उनकी पुत्री की बहुत ज्यादा मेहनत लगी थी और उसकी मेहनत से ही यह पुस्तक तैयार हुई थी| आज भी इस पुस्तक को जैन समुदाय के लोग बड़े ही सम्मान के साथ पढ़ते हैं।

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