Karva Chauth Katha | करवा चौथ की पौराणिक व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha in Hindi

दोस्तों क्या आप भी करवा चौथ की कहानी (Karwa Chauth Ki Kahani in Hindi) के बारे में पढ़ना चाहते हैं| उससे पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि करवा चौथ का व्रत क्या है? करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है? करवा चौथ का व्रत महिलाएं क्यों रखती है? तो चलिए दोस्तों पहले हम आपको बताते हैं कि करवा चौथ का व्रत क्या है और उसके बाद हम आपको Karwa Chauth Ki Kahani in Hindi बताएंगे।

करवा चौथ का व्रत क्या है?

करवा चौथ का व्रत महिलाओं के द्वारा अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है| यह व्रत सुहागनों के लिए अखंड सौभाग्य देने वाला होता है| इस दिन सभी सुहागने अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं| वह सुबह सरगी खा कर अपना व्रत शुरू करते हैं और उसके बाद व्रत की कथा भी पड़ती है और फिर वह रात को चंद्रमा को देख कर उसे अर्ध्य कर खाना खाती है| जिससे माना जाता कि अगर वह करवा चौथ का व्रत रखती है तो उनके पति के जीवन के लिए बहुत ज्यादा अच्छा होता है और उनके पति की उम्र भी लंबी होती है।

1. करवा चौथ की की पौराणिक व्रत कथा (Karwa Chauth Vrat Katha in Hindi)

एक समय की बात है कि एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी| भाई अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्यार करते थे| वह इतना ज्यादा प्यार करते थे कि जब भी वह खाना खाने लगते थे पहले अपनी बहन को खाना खिलाते थे और उसके बाद खुद खाना खाते थे| फिर कुछ समय बाद उसकी बहन की शादी हो गई और वह अपने ससुराल चली गई| काफी महीने बीतने के बाद उसकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी| 

उस समय जब उसका एक भाई शाम को अपना व्यापार बंद करके घर आया तो वह खाना खाने लगा था| जैसे ही वह खाना खाने लगा उसने अपनी बहन को देखा कि वह कुछ भी नहीं खा रही है तो उसने अपनी बहन को बोला कि वह खाना क्यों नहीं खा रही है तो उसकी बहन करवा ने बताया कि आज करवा चौथ का व्रत है| मैं चंद्रमा को देखकर और उसे अर्ध्य दे कर ही खाना खा सकती हूं| लेकिन अभी तक चंद्रमा नहीं निकला है तो वह अभी खाना नहीं खा सकती है।

करवा के सारे भाई उसे बहुत ज्यादा प्यार करते थे| उस के सबसे छोटे भाई से करवा की हालत देखी नहीं जा रही थी तो उसने एक युक्त बनाई वह दूर पीपल के पेड़ पर जाकर दीपक जलाकर उसको चलनी की ओट पर रख देता है| दूर से देखने पर वह चतुर्थी का चांद के जैसे प्रतीत होता है| इसके बाद सबसे छोटे भाई ने अपनी बहन करवा को बोला कि चांद निकल आया है उसे देख कर अपना व्रत खोल सकती है और खाना खा सकती है| यह बात सुनकर करवा बहुत खुश हो गई| वह खुशी से सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखती है और उसे अर्ध्य करके खाना खाने लगती है| 

जैसे ही करवा भोजन का पहला टुकड़ा अपने मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है, फिर जब वह दूसरा टुकड़ा मुंह में डालती है उसके मुंह से बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालती है तो उसको उसके पति के मरने की खबर मिलती है| जिसको सुनकर बोखला जाती है| उसके बाद उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत करती है और बताती है कि कैसे उसके छोटे भाई की वजह से उसे करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से तोड़ा है| जिसकी वजह से चौथ माता नाराज हो गई हैं और उस से उसके पति को छीन लिया गया है। 

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और उसे पुनर्जीवन दिलाकर ही रहेगी| पूरे 1 साल तक अपने पति के पास बैठी रहती है और उसका ध्यान रखती है और उस पर उगने वाली घास को एकत्रित करती रहती है| फिर 1 साल पूरा होता है करवा चौथ का व्रत फिर से आता है| उसकी सारी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती है और करवा से आशीर्वाद लेने के लिए जाती है| तब करवा अपनी प्रत्येक भाभी को “यम सुई ले लो, पिया सुई दे दो” मुझे भी अपने जैसी सुहागन बना दो ऐसा आग्रह करती है| लेकिन उसकी भाभी उसे कहती है कि तुम दूसरी भाभी से आग्रह करो यह कह कर वहां से जाने लगती है| 

इस प्रकार जब छठे नंबर वाली भाभी आती है तो उसको भी यही आग्रह करती है| फिर भाभी बोलती है कि उसके छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था| जिसकी वजह से उसके पति की मृत्यु हो गई थी| तो वह अपने छोटे भाई की बीवी को आग्रह करें उसमें ही यह शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है| जब तुम्हारे छोटे भाई की पत्नी तुम्हारे पास आएगी तो तुम उस से यह आग्रह करना| उसे पकड़ लेना, उसे जाने मत देना, जब तक वह तुम्हारी बात नहीं मानती है| 

ठीक वैसा ही होता है जब उसके सबसे छोटे भाई की बीवी उसकी भाभी उसके पास आती है तो करवा उस से आग्रह करती है और उसकी भाभी टालमटोल करने लगती है| तब करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है| भाभी उससे खुद को छुड़वाने की कोशिश करती है, उसे नोचती है परंतु करवा उसे नहीं छोड़ती है| उसकी भाभी करवा की तपस्या को देखकर खुश हो जाती है और फिर वह अपनी छोटी उंगली को चीरकर उसमें से अमृत निकालकर उसके पति के मुंह में डाल देती है। अमृत पीते ही उसका पति श्रीगणेश श्रीगणेश का जाप करता हुआ उठकर बैठता है और इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा ने अपना सुहाग वापस मिल जाता है।

2. वीरवती की कहानी – Veeravati ki kahani (Karwa Chauth Ki Kahani)

बहुत समय पहले की बात है कि एक वीरवती नाम की राजकुमारी थी| जब वह राजकुमारी बड़ी हुई तो उसकी शादी एक राजा से कर दी गई| शादी होने के बाद वह राजकुमारी अपने ससुराल में चली गई| फिर कुछ महीनों के बाद करवा चौथ के व्रत का दिन आया और वह राजकुमारी अपने मां के घर में करवा चौथ का व्रत करने के लिए आई थी| वीरवती ने भोर होने के साथ ही करवा चौथ का व्रत शुरु कर दिया था| वीरवती बहुत ही नाजुक और कोमल लड़की थी| जिसकी वजह से वह करवा चौथ के कठोर व्रत को सहन नहीं कर पा रही थी| 

उसकी हालत बहुत ज्यादा खराब हो रही थी और शाम होते-होते वह बेहोश भी हो गई थी| तब वीरवती के भाइयों ने देखा कि उनकी बहन की हालत बहुत ज्यादा खराब हो रही है| उसके सात भाई थे वे उसे बहुत ज्यादा प्यार करते थे| उनसे अपनी बहन की हालत को देखा नहीं जा रहा था| उन्होंने फिर युक्त बनाई और दूर पहाड़ी पर आग लगाकर उसे चंद्रमा बनाकर अपनी बहन को बता दिया और उसको भोजन खिला कर उसका व्रत करवा दिया| 

जैसे ही वीरवती ने अपने मुंह में भोजन का पहला निवाला डाला तो उसे उसके पति के मरने की खबर मिली और वह उसी समय अपने पति के घर जाने के लिए रवाना हो गई| रास्ते में जाते हुए उसे भगवान शिव और माता पार्वती मिले| उन्होंने उसे बताया कि तुमने झूठा चांद देखकर गलत तरीके से करवा चौथ के व्रत को तोड़ा है| इसी वजह से तुम्हारे पति की जान गई है| यह बात सुनकर वीरवती हैरान हो गई सारी बात का पता चला तो वह है माता पार्वती और शिव से माफी मांगने लगी| तब माता ने उसे वरदान दिया कि उसका पति तो ठीक ठीक हो जाएगा परंतु वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होगा|  यह सुनकर वीरवती अपने महल की ओर चल पड़ी| 

जब वह महल में पहुंची तो उसका पति की हालत बहुत ज्यादा खराब थी और वह बेहोश पड़ा था और उसके शरीर पर बहुत सारी सुइयां चुभी हुई थी। तब वीरवती ने अपने पति की देखभाल करना शुरू कर दिया और वह रोजाना एक सुई अपने पति के शरीर से निकालने लगी| इस तरह करते-करते पूरा साल बीत गया और अगले साल फिर करवा चौथ का व्रत आया| वीरवती ने अपने पसंद का करवा लेने के लिए सोचा और वह करवा लेने के लिए बाजार में चली गई। पीछे से एक दासी ने राजा के शरीर पर लगी हुई आखरी सुई को निकाल दिया| जैसे ही राजा के शरीर से सुई निकली राजा को होश आ गया और उसने सामने बैठी दासी को अपनी रानी समझ लिया| 

जब वीरवती वापस आई तो उसे दासी बना दिया गया| लेकिन फिर भी रानी वीरवती ने अपने करवा चौथ के व्रत का पालन पूरी श्रद्धा और विश्वास से किया और अपने व्रत को पूरा किया| काफी समय बीत गया और फिर 1 दिन राजा ने किसी दूसरे राज्य के लिए रवाना होना था| तब राजा ने वीरवती से पूछा तुम्हें कुछ मंगवाना है तो बताओ तो उसने राजा को बोला कि मेरे लिए एक जैसी दो गुड़िया ले आना| 

वीरवती हमेशा गीत गाने लगी – “रोली की गोली हो गई, गोली की रैली हो गई” 

जब राजा ने यह गीत सुना तो उसने वीरवती से मतलब पूछा| तब वीरवती ने बताया कि रानी दासी बन गई और दासी रानी बन गई| फिर वीरवती ने राजा को पूरी कहानी सुनाई| पूरी कहानी सुनने के बाद राजा बहुत पछताया और उसने वीरवती को दोबारा से राजकुमारी बना दिया और उसे सारे साही मान सम्मान लौटा दिए| इस तरह वीरवती ने माता पार्वती के आशीर्वाद और अपने विश्वास और भक्ति पूर्ण निष्ठा से अपने पति और मान सम्मान को वापस लिया।

3. साहूकार की बेटी की कहानी  – करवा चौथ की कहानी  (Karwa Chauth Ki Kahani)

एक गांव में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी| सातो भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे| जब उनकी बहन की शादी होगी तो वह अपने ससुराल चलेगी| कुछ महीनों के बाद करवा चौथ के व्रत का दिन आया| तब सेठानी ने अपनी बहू और बेटी के साथ अपने घर पर करवा चौथ का व्रत रखने का सोचा| सातो भाई हमेशा अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्यार करते थे और उस दिन भी भाइयों ने खाना खाने के लिए अपनी बहन को बोला तो उनकी बहन ने बोला कि मैं अभी खाना नहीं खा सकती हूं| आज मेरा करवा चौथ का व्रत है| मैं चांद देखकर उसे अर्ध्य कर कर ही खाना खाऊंगी| 

भाइयों ने सोचा कि बहन भूखी रहेगी इसलिए एक भाई ने दीया लिया और उस दिए को लेकर पहाड़ी पर चला गया| वहां पर उसने दिए को चलाया और छलनी ढक दिया और जाकर अपनी बहन को बोला कि देखो चांद निकल आया है| अब तुम चांद को देखकर अपना व्रत खोल सकती हो| तो उनकी बहन भी चांद को देखकर खुश हो गई और वह अपनी भाभियों के पास चली गई और बोला कि चांद निकल आया है चलो भाभी अब हम व्रत खोलते हैं| तो उसकी भाभियों ने कहा कि यह चाँद तुम्हारे लिए निकला है, हमारा चांद तो अभी देरी से आएगा|  वहां से चली गई| फिर वह चांद को देखकर अपने भाइयों के साथ खाना खाने के लिए बैठ गई| 

जैसे ही उसने भोजन का पहला निवाला अपने मुंह में डाला तो उसके मुंह में बाल आ गया, फिर उसने दूसरा निवाला अपने मुंह में डाला तो उसके मुंह में कंकर  आ गया| जैसे ही वह तीसरा निवाला अपने मुंह में डालने लगी तो उसके ससुराल से बुलावा आया कि बेटा बहुत बीमार है बहू को जल्दी भेज दो| यह बात सुनकर सेठानी ने अपनी लड़की के लिए कपड़े निकालने के लिए संदूक में हाथ डाला| जैसे ही उसने संदूक में हाथ डाला तो अंदर से सफेद रंग का कपड़ा निकला| सेठानी ने दोबारा से हाथ डाला दोबारा से सफेद रंग का कपड़ा फिर निकला| उसने सफेद रंग का कपडा अपनी बेटी को दे दिया को सफेद रंग का कपड़ा दे दिया| 

उसकी बेटी सफेद रंग का कपड़ा पहन कर अपने ससुराल की और निकलने ही लगी थी कि उसकी मां ने बोला कि यह सोने का सिक्का तुम अपनी साड़ी के पल्लू के साथ बांध लो| रास्ते में जो भी तुम्हें मिले उसके पैर छूना और उसका आशीर्वाद लेना| जो भी तुम्हें अमर सुहाग का आशीर्वाद दे उसे यह सोने का सिक्का देकर पल्लू में गांठ बांध देना| फिर उसकी बेटी वहां से चली गई| रस्ते में उसे बहुत सारे लोग मिले उसने काफी लोगों के पेअर छूए परंतु किसी ने भी अमर सुहाग आशीर्वाद नहीं दिया| 

फिर वह ससुराल पहुंची उसने देखा कि पालने में उसके जेठ की लड़की झूल रही थी| वह उसके पैर छूने लगी तो वह बोली ” सीली हो सपूती हो, सात पूत की माँ हो”|  यह आशीष सुनते ही उसने सोने का सिक्का निकाल कर उसे दे दिया और पल्लू के साथ गांठ बांध ली| उसके बाद वह अपने घर में प्रवेश होने लगी जैसे ही वह अपने घर में प्रवेश हुई उसने देखा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है| वह अपने पति को कहीं भी लेकर जाने नहीं नहीं दे रही थी| वह अपने मृत पति के पार्थिव शरीर के साथ ही रहने लगी और उसकी देखभाल करने लगी| फिर सास ने बचा हुआ ठंडा बासी खाना नौकरानी के हाथ यह कह कर भेजा कि जाओ मुर्दासेवनी को जाकर खाना दे दो।

समय बीतता गया और फिर माघ का महीना आया| माघ महीने में तिल चौथ के दिन उसने माता से प्रार्था की और कहा कि माता मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है|  मुझे माफ कर दो, और मेरे सुहाग को मुझे लौटा दो, मेरे पति को तुम जीवित कर दो| तो माता ने कहा बेटी यह मेरे हाथ में नहीं है तुम्हें वैशाखी चौथ माता की प्रार्थना करनी होगी वही तुम्हें तुम्हारा पति लौटा सकती है| 

फिर उस लड़की ने वैशाखी चौथ के दिन माता से प्रार्थना करता है कि माँ मुझे मेरा पति लौटा दो| तो मां ने कहा भादुड़ी चौथ माता ही तुम्हें तुम्हारा सुहाग दे सकती है| फिर उस लड़की ने भादुड़ी चौथ माता से प्रार्थना की और माता ने उससे कहा कि सबसे बड़ी कार्तिक चौथ माता की नाराजगी के कारण ही तुम्हारे साथ यह हुआ है| वह तुमसे बहुत ज्यादा नाराज है| तुम उन्हें पर्सन कर दो| अगर तुम उन्हें प्रसन्न कर देती हो तो तुम्हें जो भी चाहिए वह मिल जाएगा| फिर वह चौथ माता की पूजा करने लगी और कार्तिक महीने में चौथ माता स्वर्ग से उतरी और गुस्से में उस लड़की के पास आई और कहने लगी 

” भाइयों की बहन करवा ले , दिन में चाँद उगानी करवा ले , व्रत भांडणी करवा ले “

उस लड़की ने चौथ माता के पैर पकड़ लिए और विलाप करने लगी है माँ मुझसे गलती हो गई है, मैं नासमझ थी, झे माफ कर दीजिए, मुझे इतना बड़ा दंड मत दीजिए, आप तो जग माता है, आप मेरी इस इच्छा को पूरा कर दे, मेरी बिगड़ी बना दो, मेरे पति को जीवित कर दो| माता उसकी निष्ठा से खुश हो गई और खुश होकर उसे अमर सुहाग का आशीर्वाद दे दिया| उसका पति उठा और बोला कि मैं काफी गहरी नींद में सो रहा था| तब उस लड़की ने अपने पति को पूरी कहानी सुनाई और बताया कि 1 साल से वह उसकी सेवा कर रही थी और चौथ माता ने उसका सुहाग से लौटाया है| यह सुनकर उसके पति ने कहा कि हमें चौथ माता अध्यापन करना चाहिए| उन्होंने चौथ माता की कहानी सुनी और चूरमा बनाकर उद्यापन करा और फिर वह दोनों खा पीकर चोपड़ खेलने लगे।

फिर नौकरानी उस लड़की के कमरे में उसे खाना देने के लिए आई तो उसने देखा कि उसका पति तो जिंदा हो गया है| तो तुरंत जाकर उसने उस लड़की की सास को बताया| सांस में आकर देखा तो बहुत खुश हो गई| फिर उसने अपनी बहू से पूछा कि यह कैसे हुआ है तो बहू ने सास को बताया कि यह चौथ माता की कृपया है. उनका आशीर्वाद है| जिस तरह चौथ माता की कृपा देखकर सभी लोग बहुत खुश हो गए और सभी स्त्रियों ने पति की दीर्घायु के लिए चौथ माता का व्रत करने का निश्चय कर लिया| चौथ माता जैसे साहूकार की बेटी का सुहाग अमर किया वैसे सभी का करना| कहने सुनने वालों को, हुंकारा भरने वालों को सभी को अमर सुहाग देना।

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